• धन्यवाद प्रस्ताव के बहाने

    आप नाम बदल रहे हो, संसद की अधोसंरचना बदल रहे हो, तो उस परंपरा को क्यों नहीं बदलते, जो ब्रिटिश ग़ुलामी की प्रतीक है

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    - पुष्परंजन

    आप नाम बदल रहे हो, संसद की अधोसंरचना बदल रहे हो, तो उस परंपरा को क्यों नहीं बदलते, जो ब्रिटिश ग़ुलामी की प्रतीक है? संसद में राष्ट्रपति का अभिभाषण, और धन्यवाद प्रस्ताव की शुरूआत हुई कहां से? नेहरू की ग़लतियों को दुरूस्त करना यदि आपका राजनीतिक अजेंडा है, तो इसे भी सही कीजिए।

    गुरूवार को संसद में धन्यवाद प्रस्ताव के नाम पर जब संग्राम छिड़ा हुआ था, तब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू कहां थीं? उस समय वह गुरूग्राम के भौंराकलां स्थित प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ओम शांति रिट्रीट सेंटर (ओआरसी) में परिवार सशक्तिकरण अभियान का शुभारंभ कर रही थीं। भाषण का जो बड़ा हिस्सा राष्ट्रपति ने बिना पढ़े दिया, वह वाकई इस देश में सरकार और समाज के लिए चिंतन का विषय है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा, 'परमात्मा ने हमें दो रास्ते दिये हैं। एक है काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या और न$फरत का, और दूसरा है सुख, शांति, आनंद, प्रेम और पवित्रता का। अब हमें यह तय करना है कि हम किस रास्ते को चुनना चाहते हैं।' क्या राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू यह दिव्य ज्ञान केवल 'ओआरसी' के सभागार में उपस्थित अतिथियों को दे रही थीं, या फिर क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और नफ़रत के समवेत भाव से ग्रस्त देश के प्रधानमंत्री को संदेश दे रही थीं?

    देश का प्रधानमंत्री गुस्से से प्रकम्पित होकर प्रतिपक्ष पर हमलावर हो, और ऐसे सवाल करे जिसका नाता धन्यवाद प्रस्ताव से न हो, तो वाकई चिंता का विषय है। राहुल गांधी का नाम लिये बग़ैर यह सवाल करना कि नेहरू टाइटिल अपने नाम के आगे क्यों नहीं लगाया? इसका कोई संदर्भ राष्ट्रपति के पूरे अभिभाषण में नहीं था। पीएम मोदी यही प्रश्न अपनी ही पार्टी के सांसद वरूण गांघी से क्यों नहीं पूछते? 31 जनवरी 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संसद को संबोधित किया था। उसपर धन्यवाद देने में पूरे दस दिन लग गये। गुस्से में कोई संसदीय मर्यादा भूल जाए, तो सदन चला रहे स्पीकर का कर्तव्य होता है कि उसके आपत्तिजनक बयान को रिकार्ड से हटा दे। मगर, हो उलटा रहा है। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का बयान क्या एक्सपंज करने लायक़ था? द्रौपदी मुर्मू को धन्यवाद भर देना है, तो संसद में महाभारत छेड़ बैठे। द्वापर में भरी सभा में द्रौपदी का अपमान हुआ था, आज के भारत में भी यही हो रहा है।

    वर्ष 2017 में संसद की कार्यवाही के हर मिनट की क़ीमत थी, ढाई लाख रूपये। अब उसे डबल मानिये। पांच लाख प्रति मिनट के हिसाब से जोड़ लीजिए कि पूरे दस दिन देश के टैक्स पेयर्स के कितने सौ करोड़ बर्बाद हुए। प्रतिपक्ष का एक नेता पांच सवाल पूछता है। अडानी पर जेपीसी की मांग सदन में होती है, तो ये सब नहीं होना चाहिए था क्या? माना कि देश के प्रधानमंत्री को निशाने पर लेकर 'चौकीदार चोर है', 'हम दो-हमारे दो', 'देश के पैसे से खाई मलाई, मोदी अडानी भाई-भाई' का नारा सदन में नहीं लगना चाहिए था, मगर इस लक्ष्मण रेखा को लांघने की शुरूआत किसने की थी? 31 जनवरी 2023 से अबतक, संसद में जो शब्दभेदी बाण छोड़े गये, उसकी 'सिल्वर जुबली' सोशल मीडिया पर हो चुकी है।

    अगस्त 2013 का संसद सत्र मुझे अच्छी तरह याद है, जब मनमोहन सिंह के विरूद्ध 'प्रधानमंत्री चोर है' के नारे लगे थे। उस नारेबाज़ी के साथ बीजेपी और उसके समर्थक सांसद सत्र का वाकआउट कर गये थे। मतलब, आप कीचड़ उछालो तो कमल बन जाए, दूसरा वही करे, तो वह संसदीय मर्यादा का उल्लंघन है। है तो दोनों ही अप्रिय। मगर, जब सत्ता में बैठे लोगों की खाल मोटी हो जाती है, तब इसी तरह की प्रतिक्रियाएं दरपेश होती हैं।

    उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरूण जेटली से पूछा था, ' आप ही बतायें, दुनिया के किसी भी संसद में अबतक 'प्रधानमंत्री चोर है' के नारे लगे हैं क्या?' सदन में यह सब बोलते समय संज़ीदा से दिखने वाले मनमोहन सिंह लहज़ा रूखा, और सख्त था। दस साल बाद, आप यदि उसी सदन में प्रधानमंत्री मोदी की भाव-भंगिमा से मनमोहन सिंह की तुलना कीजिएगा, तो ज़मीन आसमान का अंतर दिखेगा। तब आपको मणिशंकर अय्यर का बहुचर्चित वाक्य याद आयेगा।
    आप देश के प्रधानमंत्री हैं, चुनांचे संसदीय मर्यादा आपसे शुरू और आप पर ही समाप्त होती है। गली के छिछोरे से शालीनता की उम्मीद हम वैसे भी नहीं करते। मगर, देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति का एक-एक व्यवहार समाज और उसके संसदीय साथियों के लिए अनुकरणीय होता है। इसलिए ब्रह्माकुमारी ओम शांति रिट्रीट सेंटर के मंच से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो कुछ कहा, वह मानीख़ेज़ है। उसपर इस समाज में उच्च पदों पर बैठे लोगों को सबसे पहले ग़ौर करना चाहिए। देर-सवेर इस सवाल को उठना है कि पिछले एक दशक से संसद में धन्यवाद प्रस्ताव के नाम पर जो तमाशा हो रहा है, उसे रोकेगा कौन?

    हम यह भी नहीं कह सकते कि संसदीय परंपरा में संशोधन संभव नहीं। 1951 में हुए पहले संविधान संशोधन के तहत अनुच्छेद 87 (1) में यह प्रावधान किया गया कि आम चुनाव के बाद पहले सत्र, और हर साल के शुरूआती सत्र में संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति अभिभाषण देंगे। एक घटना की चर्चा मैं ज़रूर करूंगा, जब 28 फ रवरी 1977 को बिना राष्ट्रपति के अभिभाषण के राज्यसभा का सत्र हुआ था। उस कालखंड में लोकसभा विघटित हो चुका था।

    ऐसा हम मानकर चलते हैं कि राष्ट्रपति का अभिभाषण हमारे देश की संवैधानिक जरूरत है। कोई सर्वोच्च व्यक्ति तो चाहिए, जो संसदीय कार्यवाही का सूत्रधार हो। राष्ट्रपति उस ज़िम्मेदारी का निर्वहन करें, यह सर्वथा उचित है। मगर, सवाल धन्यवाद ज्ञापन के बहाने संसद में हो रहे संग्राम का है। संसद में धन्यवाद का ढब जिस तरह से बदला है, उसे देखकर सभासदों द्वारा राष्ट्रपति के प्रति सम्मान प्रकट करने की अनुभूति नहीं होती। संसद सत्र में लड़ना-भिड़ना तो चलता रहेगा, यह दुनिया के सभी सदनों में है। किंतु इस महाभारत के लिए राष्ट्रपति के कंधे का इस्तेमाल क्यों हो? इसलिए इस 'धन्यवाद' नामक घातक वायरस से मुक्ति का समय आ गया है।

    अनुच्छेद 52 से 62, राष्ट्रपति की शक्तियां और उनके अधिकारों की व्याख्या करता है। संविधान के अनुच्छेद 86 (1) में राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि उनकी जब इच्छा हो, संसद के किसी एक सदन या दोनों सदनों में अभिभाषण दे सकती हैं। हालांकि, आज तक इस आर्टिकल का इस्तेमाल नहीं हुआ है। दोनों सदनों में सालभर में तीन सत्र होते हैं। पहला- बजट सत्र, दूसरा- मानसून सत्र, और तीसरा- शीतकालीन सत्र। लोकसभा के नियम 16 और राज्यसभा के नियम 14 के अनुसार, 'अध्यक्ष को सदन के नेता या प्रधानमंत्री से राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का समय तय करना होता है। लोकसभा के नियम 17 के तहत, सदन का कोई एक सदस्य धन्यवाद प्रस्ताव पेश करता है, जिसका अनुमोदन दूसरा सदस्य करता है। इसके प्रकारांतर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा होती है।'

    दोनों सदनों के सांसद धन्यवाद प्रस्ताव में संशोधन की मांग भी कर सकते हैं। ये संशोधन उन विषयों के बारे में दिए जाते हैं, जिनका उल्लेख राष्ट्रपति के अभिभाषण में किया गया हो, या फ़िर ऐसे विषयों पर भी दे सकते हैं जिनका ज़िक्र अभिभाषण में किया जाना चाहिए था। ऐसा कई बार हुआ भी है। उदाहरण स्वरूप 1980, 1989, 2001, 2015, 2016 में ऐसे संशोधन किये गये थे। किंतु, दोनों सदनों के किसी भी सदस्य को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सदस्य बहस कर सकते हैं, मगर सदस्य ऐसे विषय नहीं उठा सकते, जिसका सीधा संबंध सरकार से नहीं है। बहस के दौरान राष्ट्रपति का नाम नहीं ले सकते, क्योंकि अभिभाषण का प्रस्ताव सरकार तैयार करती है।

    ख़ैर! आप नाम बदल रहे हो, संसद की अधोसंरचना बदल रहे हो, तो उस परंपरा को क्यों नहीं बदलते, जो ब्रिटिश ग़ुलामी की प्रतीक है? संसद में राष्ट्रपति का अभिभाषण, और धन्यवाद प्रस्ताव की शुरूआत हुई कहां से? नेहरू की ग़लतियों को दुरूस्त करना, यदि आपका राजनीतिक अजेंडा है, तो इसे भी सही कीजिए। धन्यवाद के बहाने विगत एक दशक से संसद में जो कुछ होने लगा है, वह समय और टैक्स पेयर्स के पैसे की बर्बादी है। या, यों कहें कि देश और समाज के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

    क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय, 1959 और 1963 को छोड़कर अपने पूरे शासनकाल में संसद के दोनों सदनों को 67 बार संबोधित कर चुकी थीं। 'स्टेट ओपनिंग स्पीच', जिसे 'किंग्स या क्वींस स्पीच' भी कहते हैं, अब क्वीन एलिज़ाबेथ के उत्तराधिकारी किंग चार्ल्स तृतीय (प्रिंस ऑफ वेल्स या प्रिंस चार्ल्स से मशहूर) के ज़िम्मे है। यों क्वीन एलिज़ाबेथ जब चलने-फिरने में असमर्थ थीं, बर्किंघम पैलेस से $फरमान आया कि रीजेंसी अधिनियम के तहत 10 मई 2022 को ब्रिटिश संसद का 'स्टेट ओपनिंग स्पीच', साम्राज्ञी की तरफ़ से प्रिंस ऑफ वेल्स पढ़ेेंगे, उस मौक़े पर उनके पुत्र प्रिंस विलियम उपस्थित रहेंगे।

    ब्रिटिश संसद के साझा सत्र में स्पीच ख़त्म होने के बाद क्वीन एलिज़ाबेथ शानो-शौकत के साथ सदन से चली जाती थीं। गोकि उस ड्राफ्ट को तैयार करने में ब्रिटिश प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट की भूमिका होती है, इसलिए 'स्टेट ओपनिंग स्पीच' पर चंद दिनों तक बहस होती। कुछ संशोधन के साथ 'स्टेट ओपनिंग स्पीच' को दोनों सदनों से पास कर दिया जाता। किसी वजह से ब्रिटिश सदन में 'स्टेट ओपनिंग स्पीच' पर प्रस्ताव पास नहीं हुआ, तो आम चुनाव होना सुनिश्चित मानिये। ऐसी सूरत भारत में नहीं है कि राष्ट्रपति का धन्यवाद प्रस्ताव पास नहीं हुआ, तो सरकार गिर जाये और आम चुनाव हो जाए। लेकिन धन्यवाद प्रस्ताव जैसा गले का घेघ ब्रिटेन वालों ने नहीं पाल रखा है। ब्रिटेन में 'स्टेट ओपनिंग स्पीच' की शुरूआत 16वीं सदी में हुई थी। मगर, आधुनिक ब्रिटेन इसे 1852 में पैलेस ऑफ वेस्टमिंस्टर के बन जाने के बाद से रेखांकित करता है। ब्रिटेन में राजा का अस्तित्व है, तो 'स्टेट ओपनिंग स्पीच' की परंपरा जीवित है। क्या भारत में राजतंत्रीय लोकतंत्र है?

    pushpr1@rediffmail.com

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